मनीष शुक्ल 'मनी'

मनीष शुक्ल 'मनी'

Monday, January 10, 2011

तू ठहर के देख जरा दो पल,,,,,,,,

जहा तू है तेरी वफ़ा है तेरी जवानी भी है
उन गलियों में ज़िन्दा मेरी कहानी भी है

तू ठहर के देख जरा दो पल वहा
ठहरी हुई अपनी निशानी भी है

तू किस गम में है ये बतलादे मुझे
देख तेरे पीछे मेरी जिंदगानी भी है

ये तेरी वफ़ा है जो ज़िन्दा हू मै
देख तेरी ऐसी मेहेरवानी भी है

'मनी'आज हालातो में बहुत उलझा हू
क्यों संग अपने ऐसी कहानी भी है
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,मनीष शुक्ल

2 comments:

  1. बहुत ही सुंदर .... एक एक पंक्तियों ने मन को छू लिया ...

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  2. स्वागत है आपका संजय जी ,,,,,,,,,शुक्रिया

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