मनीष शुक्ल 'मनी'

मनीष शुक्ल 'मनी'

Wednesday, December 15, 2010

तुम ऐसे न खुद को चुराया करो , कभी सामने आ भी जाया करो

तुम ऐसे न खुद को चुराया करो
कभी सामने आ भी जाया करो

मै देखने के लिए बैठा हु देखो
कभी तो नजरे मिलाया करो

मै जगता हु सारी राते यहाँ पर
कभी खाव्बो में भी आया करो

बहुत उदास हू आज कल
कभी हँसा भी जाया करो

अब तो लोग कहने लगे है दीवाना
कभी खुद भी हिम्मत दिखाया करो

अब इतना न यु सताया करो
कभी तो दिल से लगाया करो
................मनीष शुक्ल

Tuesday, December 14, 2010

तू भी नहीं अब तेरा एहसास भी


तू भी नहीं अब तेरा एहसास भी नहीं
उगते हुए सूरज को तेरी आस भी नहीं

दोस्ती कि कितनी झूठी दुहाई दोगे' के
अब दोस्ती के तू आस पास भी नहीं

कितनो को दोस्त कहके तू ने यहाँ लूटा 'कि
अब रहा किसी का तुझ पर विश्वास भी नहीं

कब तक गिनाते रहोगे वो एक एहसान अपना'कि
'मनी'इनको होगा कभी इसका एहसास भी नहीं

तू भी नहीं अब तेरा एहसास भी नहीं
गते हुए सूरज को तेरी आस भी नहीं
'''''''''''''''''''''''मनीष शुक्ल

Monday, December 13, 2010

आज क्यों वो फिर याद आया क्यों दिल ने फिर गुनगुनाया

आज क्यों वो फिर याद आया
 क्यों दिल ने फिर गुनगुनाया 

क्यों आज ये   पलके भीगी 
क्यों  उसने ऐसा गीत गाया 

कुछ तो गुनाह था शायद मेरा भी 
न मै समझ  पाया न उसने बताया

आज भी मै दीवाना हु  बहुत उसका 
पर न उसने देखा और न मैंने दिखया 

'मनी' इतना तो तय है कि मोहब्बत थी उसको
  भी 'पर न उसने माना और न मैने  मनाया 
          ....................मनीष शुक्ल                

Tuesday, December 7, 2010

............................ वाह समय तेरा क्या कहना ..........................

जिसको नसीब नहीं था तांगा कल तक 
वो आज फ्लाईट  से उड़ रहे है
और जिनके घर कल तक पैसे उगते थे 
वो आज दाने दाने को तरस रहे है  
देख उसे मन बोल उठा 
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वाह समय तेरा क्या कहना 
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ऐसे मस्ती भी देखि जो सब कुछ यहाँ लुटा बैठी 
और ऐसी मेहनत भी देखि जो खाली थी 
 सब भर बैठी देख उसे मन बोल उठा 
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वाह समय तेरा क्या कहना 
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 और ऐसे प्यारे लोग दिखे जो अंदर से बेहद प्यारे थे
पर ऐसा प्यार मिला न उनको जिसकी वो आशा करते थे 
और ऐसे पागल सनकी देखे जो अन्दर से भी घातक थे
और ऐसे प्यारे लोग मिले उनको  जिनको कभी न सोचा था 
देख उसे मन बोल उठा
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वाह समय तेरा क्या कहना 
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ऐसे मिले गरीब जो अंदर से भाओ में डूबे थे
और ऐसे मिले रहीस जो अंदर से इज्ज़त रखते थे 
और ऐसे मिले फ़कीर जो मन से दुआ अता करते थे 
देख उसे मन बोल उठा 
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वाह समय तेरा क्या कहना 
............................................................................
ऐसे मिले दीवाने जो  गहरी चाहत रखते थे 
और ऐसे चतुर मिले जो विज्ञान  ज्ञान में रखते थे
और ऐसे मिले सिपाही जो जान हथेली पर  रखते थे 
और ऐसे नेता  मिले जो देश के खातिर जीते   थे 
देख उसे बोल उठा मन 
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वाह समय तेरा क्या कहना 
..................................................................................... 
और ऐसी लगन देखि जो चपरासी से मंत्री बनते थे 
और ऐशा मंच देखा जो सिर्फ दिखावा करता  था
और ऐशी चौपाले देखि जिनसे इक सहर चला करता था 
देख उसे मन बोल उठा 
...................................................................................
वाह  समय तेरा क्या कहना 
......................................................................................  
              .........................मनीष शुक्ल 

Monday, December 6, 2010

ये पढ़ के आज वो भी मुस्कुराया होगा

ये पढ़ के आज वो भी मुस्कुराया होगा
कही कुछ उसको भी याद आया होगा 



क्यों किसी ख़ामोशी में बहुत उलझे है जनाब
लगता है किसी बेरुखी ने कल सताया होगा

इन हसी रातो को बेकार न जाने दो
क्युकी इनको भी किसी ने गुनगुनाया होगा

अरे बहुत मशहुर हुए हो अब तो
हक़ है अब तो पाया होगा

'मनी' ये मोहब्बत जो सबसे ज़ालिम है
कही इसने भी उत्सव मनाया होंगा
..........................मनीष शुक्ल

Sunday, December 5, 2010


मै खुले आम रहता हु मै खुल कर बात करता हु
हो जाये सभी सहमत ऐसे विचार रखता हु

बहुत छोटे है दिल के ये जिनके मै साथ रहता हु
मजबूरी है की रोज इनको नमस्कार करता हु

बहुत उलझा हुआ हु ये कुछ लोग कहते है
और मै चुप चाप वक़्त का इंतजार करता हु

बड़ा कातिल है ज़माना बुरे वक़्त पर ही वार करता है
मै रोता हु मै हँसता और हस्ते हुए स्वीकार करता हु

'मनी' इक वक़्त आयेगा जब ये भी सोचेंगे
'मनी' कि हु मै हल्का और बड़ी बात करता हु
................मनीष शुक्ल

Saturday, December 4, 2010

आज मैखाने की तरफ होके आते है, एक पैमाना और एक जाम बनाते है

आज मैखाने की तरफ होके आते है 
एक पैमाना और एक जाम बनाते है

गम और ख़ुशी का एक माजरा बनाते है
आज मैखाने में खूब झूम के गाते है

चाहत को हकीकत से रु बरु करते है
आज मैखाने को दिल से सजाते है

खूब पीते है और खूब पिलाते है
आज मैखाने से लडखडा के जाते है

परवाह न खुद की न रह्गुजारी की
आज मैखाने में खुद ही बिक जाते है

........मनीष शुक्ल

Friday, December 3, 2010

मै गलत हु या सही ये बताओ मुझे

मै गलत हु या सही ये बताओ मुझे 
कभी तो हकीकत  में  लाओ  मुझे 

ये मेरे चाहने वालो 
कुछ तो समझाओ  मुझे

आज भी जीता हु खयालो में
इस आदत   से बचाओ मुझे  

कहा हु मै     कहा  खोया हु 
इक रास्ता तो दिखाओ मुझे 

'मनी' सबके के है अलग भाव यहाँ 
'मनी' इक इक को  समझाओ मुझे 
       ..................मनीष शुक्ल 

Tuesday, November 30, 2010

ऐ अजनबी तेरे आने का "शुक्रिया "

ऐ अजनबी तेरे आने का "शुक्रिया "
इस रूठे हुए को मानाने का"शुक्रिया "

आवारगी से नवाजा है जमाने ने इसे
तेरा इस से दिल लगाने का "शुक्रिया "

बड़ी खामोश है जिन्दगी इसकी
संग इसके मुस्कुराने का "शुक्रिया "

घर होते हुए भी बेघर रहा
इसके संग घर बसाने का "शुक्रिया "

"मनी" समझ होके भी न समझे लोग
तेरा इसको समझ जाने का "शुक्रिया "