मनीष शुक्ल 'मनी'

मनीष शुक्ल 'मनी'

Monday, December 6, 2010

ये पढ़ के आज वो भी मुस्कुराया होगा

ये पढ़ के आज वो भी मुस्कुराया होगा
कही कुछ उसको भी याद आया होगा 



क्यों किसी ख़ामोशी में बहुत उलझे है जनाब
लगता है किसी बेरुखी ने कल सताया होगा

इन हसी रातो को बेकार न जाने दो
क्युकी इनको भी किसी ने गुनगुनाया होगा

अरे बहुत मशहुर हुए हो अब तो
हक़ है अब तो पाया होगा

'मनी' ये मोहब्बत जो सबसे ज़ालिम है
कही इसने भी उत्सव मनाया होंगा
..........................मनीष शुक्ल

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